गया जी में पिंडदानत्रिवेदी की पावन परंपरा एवं शास्त्रोक्त विधि
सनातन धर्म में गया जी को पितरों के मोक्ष का परम द्वार माना गया है। जानिए फल्गु, विष्णुपद और अक्षयवट की तीनों पावन वेदियों पर विधि कैसे संपन्न होती है।

त्रिवेदी की तीन मुख्य वेदियाँ
१. फल्गु नदी तीर्थ (Falgu River)
प्रथम चरण में फल्गु नदी के पावन तट पर स्नान, आचमन, कुश व तिल से तर्पण एवं बालू के पिंड का अर्पण किया जाता है। यहाँ माता सीता द्वारा महाराज दशरथ जी को बालू का पिंडदान दिए जाने का अति पावन प्रसंग है।
२. विष्णुपद मंदिर वेदी (Vishnupad Temple)
द्वितीय चरण में भगवान श्री गदाधर (विष्णु) के अष्टकोणीय रजत कुंड में स्थापित दिव्य चरण चिह्नों पर जौ के आटे और तिल से बने मुख्य पिंड अर्पित किए जाते हैं।
३. अक्षयवट धाम (Akshayavat)
तृतीय एवं अंतिम चरण में अमर वटवृक्ष 'अक्षयवट' के नीचे पिंडदान संपन्न करके ब्राह्मण को दक्षिणा व 'सुफल' लिया जाता है। यहाँ पितर सदा-सदा के लिए तृप्त हो जाते हैं।
पिंडदान के लिए आपको क्या जानकारी चाहिए?
पूजा की समस्त सामग्री (जौ का आटा, काले तिल, कुशा, पात्र, फूल, रोली) पं. आनंद कुमार गुपुत जी द्वारा व्यवस्थित की जाती है। आपको केवल अपने पूर्वजों का स्मरण और मूल विवरण साथ रखना है।
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अपनी सुविधा और तिथि के अनुसार सीधे तीर्थ पुरोहित जी से परामर्श लें।